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Showing posts from February, 2022

सम्भावनाएं

 सम्भावनाएं सम्भावनाएँ बूढ़ी हो जाती है जवान हो उठती है उदासी आशा जैसे बचपन के दिन खिखियाते बंदर की तरह बार-बार चिढ़ाती है ललमुँही कुण्ठा जाने क्यों ? इसी जगह हो जाता है अडि़यल समय का घोड़ा आदमी खिसियाकर बार-बार मारता है चाबुक असफलता मितवा होना चाहती है कहीं से फूटता है अंकुर लकवाग्रस्त विवेक जूझता है परिस्थितियों से  जैसे पेट से चिलकती धूप में मजबूर-मजदूर मकड़ी हो जाता है धैर्य थक हार-कर भी नहीं टूटता जो तब कहीं बुनता है जाल मेहनत का  तब कहीं होती है शिकार सफलता।।  धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

रिश्ते

 रिश्ते विश्वास की सख्त धरा पर खड़े रिश्ते इतने नाजुक  होते हैं कभी गुब्बारे से फूट पड़ते हैं सड़ी सी बात चुभो जाती है शक सुई भोथी एकदम भोथी जब. भावनाओं की नाजुक रस्सी से  बँधे रिश्ते  इतने सख्त होते हैं कभी तोड़े नहीं टूटते महाबलियों के विषम परिस्थितियोें के दौर में भी पड़ नहीं पाते दौरे मनमुटाव के. धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

परिभाषा

 परिभाषा परिभाषा एक ब्रम्हपाश बाँधती शब्द कडि़यों में वृहत और निर्बाध विषय और इंजेक्शन के बाद खुराक उदाहरण जैसे आत्मसमर्पण सारी समस्याओं का मगर विश्वजीत प्रेम परिभाषा से परे पग पग को धरे जैसे जगतपाल परे विज्ञान के अनुसंधानों से. धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

मन की शांति

मन की शांति  हिन्दु मुसलमाँ सिक्ख ईसाई  जैन पारसी बौद्ध सब है यहाँ आदमी कोई नहीं एक बौद्ध हिंदू बना एक हिंदू ने करा लिया खतना जिसे बनाया गया जबरन ईसाई तब तो बुद्ध भगवान हुए फिर अल्लाह बने और फिर यीशु माना गया  सोचता हूँ सचमुच, रूप बदले होंगे साझेदारी की होगी या लड़ रहे होंगे अब तक अपने-अपने भोग लिए नाबालिगों की इस लड़ाई में वे बालिग गीता बाईबिल कुरान अवेस्ता पूजे जाते हैं सब धन्य है वह पेंड़ निस्वार्थ ढला कागज में एक देह के अंत पर  एक अल्लाह को प्यारे हुए एक स्वर्गवासी हुआ एक का महापरिनिर्वाण  गोद में समाया होगा कैसे धरती जाने मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे चर्च सब ईंट गारे और पत्थर  स्साली! शांति मिलती भी है तो  केवल मन से  केवल मन को केवल मन भर।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

शांति

शांति  जब बहुत परेशान किया विचारों के घुमड़ते बादल ने शांति की चाह में मंदिर की मूर्ति के आगे सिर नँवाया तनाव खड़े रहे अड़े एकांत में गया बादल बरसने लगे दुःखों के भीड़ में ले जाकर अपने आपको  पाया अकेला बिल्कुल अकेला शांति सोई मिली मरघट में हार कर बैठा निर्विचार निर्विचार होना था कि शांति ही नहीं, लगा मैंने मुक्ति पा ली।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

इन आँखो में

 इन आँखो में  इन आँखों में अतल गहराइयाँ हैं अतुल ऊँचाइयाँ-असीम विस्तार है अषेष कल्पनाएँ अपूर्व आभास अपार आनंद है इन आँखों में इन आँखों में अनुपम सौंदर्य है अमर जीवटता अचूक निषाने हैं अकथ कथाएँ अपठ ऋचाएँ अबूझ मरीचिकाएँ हैं इन आँखों में इन आँखों में अनगिनत हिलोरे हैं अटल से अटल को हिलोर दे अषांत बवंडर को कर दे शांत  अबोल बोल अगाध प्रेम है इन आँखों में इन आँखों में अपार-पार अमेल-मेल अनंत असंभव-संभावनाएँ अमिट रंग हैं इन आँखों में इतना सब है कह नहीं सकता मैं कह नहीं सकता हर कोई इतना सब है इन आँखों में।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

मून्यांकन

 मून्यांकन “मैं बड़ों का कहा मानती हूँ मानना चाहिए छोटों को मेरा कहा और बड़ों को निवेदन  कुछ लगते हैं इसलिए नियमानुसार भी नहीं होता पर ऐसा तब गुस्सा आता है मुझे और उदास हो जाती हूँ मैं  भाड़ मे जाये क्रिया-प्रतिक्रिया” मैं सोच रहा हूँ घर परिवार शाला समाज में सदाचार का पाठ पढ़ती दस बरस की छात्रा को उदासीकरण की इस परिभाषा पर  अंक कितना दूँ विज्ञान पेपर में और कैसे कितना करूँ आंतरिक मूल्यांकन उसका ? धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

बहाना

 बहाना किसी पौधे का स्वस्थ होना  इस बात का सबूत है बीज कितना सक्षम था जो बोया गया बच्चे माँ-बाप के प्रतिरूप होते हैं सोचे बच्चों पर दोष मढ़ने से पहले कितने कायर हैं हम कितनी चालाकी से श्रद्धा और परम्परा का भुलावा देकर ढो रहे व्यवस्था की अरथी पीढ़ी दर पीढ़ी ।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

निश्चित आयेगी सुबह

 निश्चित आयेगी सुबह   रात भटकता रहा अंधेरे और सन्नाटे में मेरा स्वप्न अकेला बेमन-अमन नींद तैरती रही  नयन जल पर  उतरने से दूर बहुत दूर हृदय की गहराईयों तक  मेरी सोच कि  संभव है निश्चित आयेगी और आयेगी सुबह  कल ही की तरह लाली लिए चमचमाते सूरज के संग।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

धरती का राजकुमार

  धरती का राजकुमार चंचल शरारती हवाओं ने  तेरी काली घनी जुल्फों को छेड़ा  मयूर हुआ मन मेरा प्रणय भार से झुकी तेरी पलकें आतुर तुम्हे कसने गिरि के महापेड़ों-सी उठी मेरी बाँहें तेरी बिंदिया चमकी कि उछाहों की असीम तरंग लिए अंतहीन भावी सपनों के उथल-पुथल बीच महासागर में तब्दील हुआ मेरा हृदय मेरा अनकहा प्रेम मेरे होंठों की प्यास भारी पड़ी तुम्हारी मौन स्वीकृति पर तुमने बरसा दी  कड़ककर, गरजकर, उमड़-घुमड़ प्रेम, प्रेम और प्रेम  और भीगता चला गया मैं मेरा तन अंतर्मन ये सावन की मतवाली घटा तू आसमाँ की राजकुमारी है तो मै धरती का राजकुमार।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

हार

 हार हृदय की अकथ पीड़ा पीकर-सीकर होंठ हो तार-तार हार-जीत जग जीत हार बन गये सुमन।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

विषाद

 विषाद  हर्ष के विरोध में खड़ा विषाद कितना सुखद है  डाँट पीकर भी बुजुर्गों के क्रोध पर  जिद के पैर पटकता बच्चे जैसा जंगल के उजाड़ के बाद घर परिवार समाज संसार यहाँ तक कि खुद से टूटकर जब  पनाह के फिराक में कोई परिंदा जहाँ भी सर छिपाना चाहे दुत्कारा जाय वह थक-हार कर भी उड़ने आकाष में आतुर फड़फड़ायेगा और निश्चित नयी शक्ति के साथ ऊँचा और ऊँचा उड़ेगा दूर बहुत दूर सच विषाद जीवन के लिए तुम स्पेशल टाॅनिक हो।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

धरती से

  धरती से कहते हैं भावनाओं के हाथ पैर नहीं होते अभिव्यक्ति को शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती पे्रम को परिभाषित नहीं किया जा सकता वह कहने की नही एहसास की वस्तु है इसीलिए अनकहे प्यार-सा अमरत्व देवताओं में भी नहीं मैं भी नहीं चाहता कहना पे्रमियों की तरह आई लव यू बस याद कर रहा हूँ तेरी अमर साँस से साँस हरी है तुझे खा-खेलकर बचपन भरा है चीर कर तेरी छाती पेट भरा है वह तेरी ही छाती है जिसने पनाह दी है जब कोई मरा है यहाँ तक कि शब्द इतिहास और समय भी किसी का भी जीना संभव न हो सका तेरे बिना तुमसे दूर पीढियाँ गुजर गयी सोचता हूँ तेरा यह बंधन तेरा यह प्यार किस तरह का है माँ।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

दुःख और जिन्दगी

  दुःख और जिन्दगी दुःख से  भाग रही होती जिन्दगी हो जाती कई भाग, दुःख से  पीछा छुड़ाने बहा रही होती जल जल जाती खुद जिंदगी, जिंदगी खुद को छिपाने बनाती खोल मुस्कराहटों की  खोल जाते पोल आँखों से दुख दुःख  कल था आज है रहेगा कल भी भटक रही जिंदगी आज कल की तलाष में जिंदगी थककर खड़ी हो जाती  भीत की तरह भयभीत दौड़ते-दौड़ते उम्रभर भर जाते दौड़ते-दौड़ते  दौड़ती छिपकलियों की तरह खचाखच दुःख जिंदगी में।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

प्रतीक्षा

 प्रतीक्षा काश! झरोखे से झाँक लेती एकाध दिन  चंद पल ही सही  मेरी कुटिया कितनी वीरान है तुम बिन प्रतीक्षा में परछट के सर झुके-झुके है  बिलकुल मौन मानो लाश ढो रहे हैं सच बताऊँ तुम्हारा साया सिमेट पोटली में बाँध लेता निहारता सुबह शाम टाँगकर किसी खूँट में बिकती बाजार में खरीद लेता मैं टेबल दीवारों पर्दों में सजा लेता तुम्हें मगर पता नहीं स्वार्थी दीवारों के बीच ही कैद रहना क्यों भाता है तुम्हें देखना एक दिन गिर जायेगी दीवार बज्र बन कर गिरेगी प्रेम की मार खण्डहर हो जायेगा नफरती महल  मेरी कुटिया में होगी चहल-पहल  तब तुम दौड़कर भीड़ को चीरती मेरे सामने आओगी बिलकुल सामने  और मुझसे लिपट जाओगी  ए खुशी! मुझे उसी दिन की प्रतीक्षा है।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

मुश्किल

  मुश्किल कहो तो भी मुश्किल न कहो तो भी मुश्किल कहना भी मुश्किल न कहना भी मुश्किल कैसे कहे क्या बुरा क्या सही है इस दुनिया में दिल से  दर्द का  रिश्ता यही है। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

सुनो

 सुनो आज फिर देखा  मैंने चेहरा  हू -ब -हू तेरा कह उठे सब, यही यही है यही केवल मैं नहीं। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

इतिहास की सड़कों पर

 इतिहास की सड़कों पर लद गये हैं दिन धूल से  पन्नों -सी कैलेण्डर के  फड़फड़ा रहीं विचार -शाखें तारीखें रफ्तार से  आ जा रही  मोटर गाडि़यों की तरह  कोई चारा नहीं अलावा आँख मींचने के  इतिहास की सड़कों पर आदमी रह गया है -ठक्क से  पंथ छोर पेड़ सा। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

बढ़ता शहर

  बढ़ता शहर इस छोर से  उस छोर तक फैल रहे परिसर लगातार सूँड से  नित नये निकल रहे चक्क से दूधिया दाँत  सफेद भवनों के  काले जादुओं के  एक से एक  कारनामों से  दिन ब दिन  विशालकाय होता  आम लोगो पर  भारी पड़ता जा रहा  मेरे कस्बे का हाथी। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

कोई कह दो अर्जुन को

 कोई कह दो अर्जुन को आँखों पर पट्टी बाँध हस्तिनापुर चैसर के दाँव- पेंच में  मस्त है व्यस्त है गुरूकुल एकलव्य का अंगूठा काट अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर सिध्द करने में। ऐसे में कौन बचायेगा लाज  द्रौपदी और विराट देश की ? कोई कह दो अर्जुन को कि यह समय रंग महल में नाचने गाने का नहीं है कि अब यह समय निकल चुका है अज्ञातवास के चंगुल से कि अब वह उठा ले अपना गांडीव कि अब वह नहीं रहा बृहन्नला। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

हम और तुम

  हम और तुम गाँठे भर आयी है  चल चलकर नंगे पाँव  पत्थर तोड़ते भर आए हैं मसल। मसलना तो दूर  नहीं रहेगा मसलन भी शेष हमारी छूअन मात्र से।   मगर, हम हम हैं तुम तुम हो नहीं चल सकते नंगे पाँव तुम डगभर मंदिरो के फर्श पर भी । बस मसलना जानते हो  निर्दोष फूलों को तलुआ चाँटते जूतों के नाल से। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

सावधान !

 सावधान ! मानवता दुबकी बैठी है कमरे में लाचारी की कुण्डी लगा द्वार  खटखटा रही गरीबी काँपते हाथों । हो गयी सूनी गलियाँ राहतों की  गश्त लगाती है  उँची सेंडल पहनें मौत मँहगाई की । आमसभा आयोजित करती /रोज कहीं न कहीं धरने पर बैठती  बिमारियाँ। चीथते चैराहे पर चील कौअें सत्य -शव पता नहीें  पाप या पुण्य से  माँग रहा मौत या जिंदगी  मगर गिड़गिड़ा रहा है धर्म कुछ। स्वार्थी श्रध्दालुओं की भीड़ बेकाबू सीखते -सीखते तैरना तरने तारने लगे बारहों मास कुंभ मेले में झूठ भ्रस्टाचार फरेब संगम पर। इठला रहा है भय अपनी अशेष जवानी पर  हो चुका पसीना श्रम पर मेहरबान  जब से टाँगा है दरवाजे पर  सुविधाओं ने बोर्ड  ’कुत्ते से सावधान।’ धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

महान

 महान  लोगों ने माँगी रोटियाँ उसने बाँटी रोटियाँ बाँटी रोटियाँ छीन सके ताकि छोड़ दिये  वाचा मानने वाले  कुत्ते। लोगों ने माँगे कपड़े  उसने ढाँके कंबल ताकि ढँके कंबल से  देख न सके लोग  काली करतूत  उनकी। लोगों ने माँगे घर उसने दिये घर दिये घर में  दीये की जगह  जलायी बत्तियाँ उजड़ो को उजाड़कर  फिर से बसाने के लिए। लोगों ने बजायी तालियाँ उसने बटोर ली  गंभीर शान से  मुखौटी मुस्कान से  सह ली गालियाँ यह कहकर कि  जो सहा न  वो महा न  और   हो गए महान। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

वातावरण

 वातावरण सुलगती है आग  अंदर ही अंदर  उपर ही उपर  उठता धुआँ है जाने क्या हुआ है सर्वत्र  धुआँ ही धुआँ हैं। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

भावना

 भावना चारा चोंच में दबाए भागती है इधर - उधर मुर्गी दौड़ते हैं दम लिए दंभ भरे पीछे - पीछे चूजे है लगा समान श्रम कूड़े - करकट कुरेदने में। यह क्या ? गटक गयी अकेले देखा हैसियत चूजे से बढ़ कर नहीं है आम आदमी की।  धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

मेरा मन

 मेरा मन समाँ में पसरी हवा काँटे से चीरती है झीनी चादर-से भीगो कर पलकें सर्द हो जाती है कली की मुस्कान खातिर उदास जिन्दगी नहीं मालूम तुम्हें हँसते देखने के लिए रोज इसी तरह  बिंधता है  मेरा मन।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

बातें

  बातें बहुत कुछ होती है ऐसी बातें सह जाते है न चाहकर भी  न चाहकर भी बातें ऐसी भी होती है बहुत कुछ कह जाते है बहुत कुछ  होती है ऐसी बातें सिर के बाल  नहीं छूती छूती ही नहीं ऐसी भी होती है बहुत कुछ बातें लग जाती है दिल को।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

जंगलराज

 जंगलराज देखा  फूलते - फलते पेड़ कंटीले और टेढ़े। सीधे सुग्घर  पेड़ कटते देखा। देखा  लड़ाई में आपसी बड़ों की छोटो को जिंदगी से जिंदगी के लिए जूझते देखा। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

जातिवाद

  जातिवाद चुम्बक खीचेगा  टिन ही क्यों न हो हीरा अमूल्य है चंदन बहुमूल्य क्या लेना क्या देना उसको उसे चाहिए जाति अपनी चुम्बक खीचेगा  टिन ही क्यों न हो। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

रास्ते

 रास्ते तंग आकर  शहर की जिंदगी से  लौटना चाहता हूँ गाँव। गाँव की ओर से  आते तो है मगर जाते नहीं रास्ते। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

हार

 हार  हदय की अकथ पीड़ा  पीकर -सी कर होंठ तार- तार हो हार -जीत जग- गए  सुमन। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

मोह

 मोह पेड़  चाहते हैं तट पर खड़े रहना नदी नहीं चाहती मोह माटी का नहीं छोड़ पाते  पेड़ न पानी  हो जाते हैं एक दूजे के  कभी बरसते हैं कभी उफनते हैं पर रीते नहीं होते। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

शीर्षक

शीर्षक अक्सर लोग/रोज की भी देखी सुनी  जानी पहचानी  गुजरी परखी  बातों चीजों व घटनाओं को  रखते चले जाते है  स्मृति के हाशिए पर कोई कोई होता है ऐसा जो उन्हें  हाशिए से निकाल  देता है स्थान समय के पन्नों पर शीर्षक  ऐसे ही बनते है। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

दुनियादारी

 दुनियादारी दुनियादारी -रिष्ते-नाते मकड़जाल सब  फँसकर  टूट छूट  टूट-छूटकर  फँस। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

माहौल

 माहौल खोटे रहे उछल  फटे रहे चल दराजें रही मचल आदमी  हो गया सवार  पैसों पर  संसार  व्यापार ! व्यापार !! व्यापार !! धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

आस्तीन

 आस्तीन  यह जानते हुए भी  कि सबसे अलग हूँ मैं सूट वालों की भीड़ में बंडी ही पहनता हूँ क्योंकि कोई कमीज ऐसी नहीं  जिसमें आस्तीन न हो और आजकल हर आस्तीन पर  साँपों की निगाहें हैं। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

माँ

 माँ चाहता हूँ माँ माँएँ अपने बच्चों की खातिर  बहन बेटी बहू सास नहीं  सिर्फ माँ बनी रहे। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

जिंदगी

 जिंदगी  सुलगती सिगरेट है जिंदगी हो जायेगी राख  मारो न मारो कश। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

छुटभैए

  छुटभैए दिन -ब-दिन बढ़ते  हल्के लोग  भारी पड़ रहे हैं हम पर  जबकि जरूरत है हमें औरों पर भारी पड़ने वाले  हल्के लोगों की। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

माँग

 माँग  माँग मत  माँग का अधिकार तू  माँग कम नहीं हो जाएगी तेरी न ही माँग सूनी होगी  तलवार उठा  कर  चीर छाती माँग की  माँग पर अधिकार तू। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

टुटपूँजिए

 टुटपूँजिए  सभी चाहने लगे है बड़े नोट दम  नाक में कर रखा है टेप चिपके चिल्हरों ने। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

समाजवाद

 समाजवाद  समाजवाद के चोले में  पूँजीवादी कागभगोड़ा वैयक्तिक समाज है  जहाँ भूख के कारण  भूखों का  भूखों पर राज है। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

शराब

 शराब  आश्चर्य होता है  दुख भी  नहीं रहे लोग पीने वाले आजकल  शराब  पी रही है  जी रही है।  धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

भागीरथी

भागीरथी  हम  विषम हिमाद्रि में  भागीरथी बहाते हैं वे  लगाकर डुबकी  भगीरथ हो जाते हैं। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346