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Showing posts from September, 2025

व्यवस्था

 व्यवस्था  व्यवस्था से आज तक  लड़कर  कोई नहीं जीता। व्यवस्था के शब्दकोष में  हार शब्द ही नहीं लिखा है। किसी भी युद्ध को लड़़ने के लिए हौसला, हुनर और हथियार की  आवश्यकता होती है इन तीनों में से कुछ भी नहीं है तुम्हारे पास। हथियारों की कमी नहीं है किन्तु आज तक  हौसले और हुनर से तुम्हारी  जमी नहीं है। चलो !  हुनर सीख भी लोगे तो हौसला कहाँ से लाओगे ? हौसले के बिना कोई भी लड़ाई  जीती नहीं जा सकती तुम्हारे पास तो वही नहीं है। हौसले  तुम लेकर तो आओ हुनर मैं सिखाऊँगा तुम्हे वो हुनर  जो किसी गुरूकुल में नहीं सिखाया जाता नहीं बताया जाता  किसी कान्वेंट स्कूल में बस, तुम्हे ढाल दिया जाता है कान्वेंट कल्चर में। तुम्हे सिर्फ इतना करना है कान्वेंट कल्चर के खिलाफ गुरूकुल की रैली में  सम्मिलित हो जाना है दरअसल  व्यवस्था से बड़ा तुर्रम-खाँ कोई नहीं हुआ  इस दुनिया में  बड़े बड़े टेपाचंद हुए वे रास्ते से  हटा दिए गए या सटा लिए गए   व्यवस्था के साथ व्यवस्था के लिए  और रख लिए गए तोप में बारूद बनाकर तुम्हे भी वह...

सच और झूठ

 सच और झूठ किसी पुरूष को स्त्री का परिधान पहना देने से वह स्त्री लग सकता है स्त्री नहीं हो सकता उसी तरह झूठ का लबादा ओढ़ाकर खड़ा कर देने से सच, झूठ नहीं हो सकता मात्र  पन्ना और तारीख बदल देने से इतिहास नहीं बदल सकता। कहते हैं किसी जमाने में ऐसे प्रतापी राजा हुए जिसके राज में शेर और बकरी एक ही घाट का पानी  पिया करते थे कितना झूठा बोलते हैं रे ! शेर और बकरी एक ही घाट का पानी  क्यों नहीं पी सकेंगे अलग-अलग समय पर ? अरे ! महाप्रतापी तो हम हैं जहाँ योगी और भोगी डॉक्टर और रोगी मंत्री और संतरी दलाल और हमाल हवाली और सवाली रक्षक और भक्षक चोर और सिपाही बनावटी, मिलावटी और सजावटी शराफत की एक ही मेज पर एक ही समय पर एक ही साथ  एक ही ब्राण्ड का पानी मिल-बैठकर, बाँटकर  गटकते हैं वह भी चखने और चुहलबाजी के साथ। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

राजा और प्रजा

  राजा और प्रजा सत्य को जानना, समझना और परखना हो तो राजा का चेहरा देख लो। राज का चहुमुखी विकास  देखना हो तो  राजा के ठाठ-बाट देख लो। राजा के हर एक बात-व्यवहार में देश की संस्कृति झलकती है एक राजा ही तो है  जिसके चाल-ढाल में  संस्कृति पनपती-पलती है। राजा कभी झूठ नहीं बोलता उसकी कथनी -करनी में रत्ती भर भी अंतर नहीं होता। उसके मुँह में जड़े सोने के दाँत खाने के नहीं हैं और न ही दिखाने के हैं वे तो सिर्फ और सिर्फ चबाने और दबाने के हैं जो देश की धरोहर हैं  उन्नति के प्रतीक हैं राजा को भूख नहीं लगती इसलिए वे खाने के सभी दाँत पेट में जमा रखे हैं देश पर आस्था रखने वाले मातृभूमि से प्रेम करने वाले सच्चे नागरिकों को  राजा के दाँतों पर  ऊँगली नहीं करनी चाहिए ऊँगली करना तो दूर ऊँगली उठाने वाले लोग राजद्रोह के अपराधी होते हैं कठोर दण्ड के भागी होते हैं किन्तु उन्हे दण्डित राजा नहीं करते क्योंकि वे दयालु होने के साथ-साथ बड़े नेकदिल इंसान है। नाहक ही वहमी, वंचक और वाचाल प्रजा राजा पर झूठा लाँछन लगाती है कि राजा लालची और विकट स्वार्थी है छल, प्रपंच और झूठ का पुलिंद...

नदी का पुल और नौकरशाह

  नदी का पुल और नौकरशाह नदी पर बना जमाने का पुल  जुन्ना और बौना है किन्तु मनोबल ऊँचा है काया बूढ़ा गयी है किन्तु हाँफ जरा भी नहीं रहा। आँधियाँ आयी थक-हारकर चली गयी बाढ़ आयी कीचड़, गर्दे, गादें आदि लाद-ओढ़ाकर चली गयी आत्मविश्वास इतना कि हर परिस्थिति में खड़ा रहा अडिग मुस्कुराता किन्तु  परदुख सरिस आनन्द नहिं भाई मंत्र का जाप करने वालों के देश में मुस्कुराना भी किसी उन्माद से कतई कम नहीं होता सो किसी न किसी की आँखों में तो  खटकना ही था वैसे भी जुन्ने, बौने और सँकरे होने के कारण वह वतनशाहों, वेतनशाहों और कमीशनशाहों सबकी आँखों में किरकिरी सा घुसड़ गया था  गौरवपथ की शुद्ध और परिष्कृत हवा खा-खाकर वे फुलकर कुप्पा जो हो गए थे दोपायों पर पैदलमार्च करने वाले चौपायों का प्रयोग जो करने लगे थे ऐसे में जुन्ना, बौना और सँकरा पुल क्यों भाएगा भला ? नए युग के उच्चमहत्वाकांक्षी और विस्तारवादियों को इसी का परिणाम है सदानीरा शिवनाथ की छाती पर नए जमाने का नया पुल अजोड़ नौकरशाही का बेजोड़ नमूना एक जुन्ना पुल है अटूट मेहनत, कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी का प्रतीक सावन आया बादल घुमड़े वर्षा आयी बाढ़ आ...