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Showing posts from March, 2022

मैंने देखा है ईश्वर को

मैंने देखा है ईश्वर को मैंने देखा है ईश्वर को ये मत पूछ कब और कहाँ पर हाँ ! मैंने देखा है ईश्वर को तिल से ताड़ तक, राई से पहाड़ तक कचरों के ढेर में, यानों की टेर में धरती के कण - कण में युग -युग के क्षण - क्षण में सागर के नीचे, आसमान के ऊपर क्षितिज के छोर तक जब - जब झाँका है आँका अमूल्य रचना संसार को मैंने देखा है ईश्वर को जीवन को जीते सलवटों में युग को बदलते करवटों में मृत्यु को पछाड़ते, रोगों को झाड़ते बारिश में भीगते, शीत में ठिठुरते तपन को तार - तार स्वेद से करते तोड़ते घुटनों पर नियति निठुर को मैंने देखा है ईश्वर को पत्थरों को तोड़ते, नदियों को मोड़ते स्वार्थी मनुजों के लिए  धरती से अंबर को गारों से जोड़ते जोड़ते कुर्सिंयाँ, जोड़ते सरकार को करके मुहैया सुविधा संसार को खाकर चटनी, नून संग बासी घट - घट के वासी झोपड़ी में लेते है खट्टी डकार को मैंने देखा है ईश्वर को निर्मोही बच्चों  की निश्छल किलकारी में निर्मम जग में खटती महतारी में  पग पग पर जूझते पिता के प्यार में अकारण रूठने पर भी बहन की मनुहार में अपने पराए गिरे पड़े बिछुड़े  पिछड़े दीन दुखियों के हृदय में उलीचते स्नेह की ...

घरघुंदिया

घरघुंदिया आकाश में जैसे नहीं होती कोई पतंग की बिसात गच्चा खा जाता  सुख, संसार स्वर्ग तेरे घरघुंदिये से बँधा मेमने सा मिमियाता खड़ा रहता किसी कोने में सुन ठक्क होते पाँव  गीत संगीत के  गुनगुनाती गीत कोई जब तू मीत्थी मीत्थी छी प्याली प्याली छी। तेरे घरघुंदिये को बाँधने का प्रयास मतलब साधारण के आगे असाधारण का चुरचुराना है हारकर मजाल ! न झुके नजर कोई तेरी ओर न तरसे तेरे साथ खेलने को बड़े से बड़ा आदमी घरघुदिये में। ओह ! मेरी बिटिया काश ! तुम्हे दे पाता तेरा घरघुंदिया जब तुम घर बसाने जाती। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

प्रेम

प्रेम  बया ही होता है जन्मजात वास्तुशास्त्री पावस की उन्माद में रचाता स्वयंवर बबूल की डाल पर सौन्दर्य की आस्था ले  झूलता एक ताजमहल हवा के गीत पर  झींगुर संगीत पर थिरकती फसलें होता जीवन मधुबन भूखी श्री भाव की  सम्मोहित हो विराजती नहीं तो फिर वही ताजमहल फिर वही स्वयंवर में दखलंदाजी तो होती देव रहे न रहे मंदिर मंदिर होता है क्यों न हो सूना आखिर प्रेम में सौन्दर्य होता है।    धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

भटकाव

  भटकाव मैने देखा है तराजू के पलड़ों को बराबर होते हैं जब  जरूरत नहीं पड़ती बाट चढ़ाने की न सामान उतारने की टिक जाती सुई जैसे दुनिया टिकी है अपनी जगह लोग कहते हैं - मर गई मानवता झूठ और पाप के जहर से दिन ब दिन भारी होता जा रहा पैसे का पलड़ा  माना मानवता हो गयी रूई सी पर्दे के पीछे जा छिपा सत्य घूसखोरी जमाखोरी नशाखोरी की मार से मँहगाई के डर से पहनकर मुखौटा बिचौलियों के हाथों  बित्ता भर पेट खातिर  इंसान बिकता है  ईमान बिकता है  पर क्यों भागता है आदमी सुख के पीछे आखिर  क्यों पराये भी अपने से लगते हैं बिकता नहीं बाजार में  नहीं मिलता हजारों कीमत पर  माता, पिता और आत्मीय स्नेह।      धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

बरगद

  बरगद  बरगद की जड़ से जड़ें जमाए अब भी वहीं खड़ा है मेरा गाँव अब भी वही लगता है चौपाल सुबह - शाम घर आँगन में फुदकने वाली गौरैया मद-होश गहारती है पात - पक्ष में बद में भी हवा आस नहीं छोड़ती बरगद की जड़े हिला देने की तोते भी टर्राने से नहीं आते बाज बाज भी आकर कभी कभार मार जाता है चोंच आपस में लड़ते गिलगिलैयों के घोसलों पर इन चिल्लपों से बेपरवाह ताकते सफेद बगुले ऊपरी शाख। बरगद के नीचे बापू के सपने की फाइल लिए खड़ा है पंचायत भवन और बगल में हैंडपंप पूरी तरह प्रतिबद्ध बूंद - बूंद रक्षा के लिए। छत की मुंडेर पर कौअे भी मुँहफाड़े गुमताड़ा लगाते हैं किसी नजूल या अनजूल टहनी पर नाजायज अधिकार के लिए और पंचायत भवन के दरवाजे पर टंगा ताला रोज मुनादी करता है पंचायत होने की जिसे सुनती है  केवल दीवार पर टंगी बापू की मूक मौन तस्वीर और दीवारें दुहराती है बापू का कथन -  बूरा मत देखो, बूरा मत सुनो, बूरा मत करो। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

मिठुवा

  मिठुवा रहे सब जन - जन दड़बों में गुटरगुँ करते इसीलिए खुले, छोड़े कि जाओगे कहाँ, ठहरे परवशी ठौर आओगे परेवा फिर इसी मिट्ठू मियाँ मितभाषी मुक्ताकाशी खा रहा रोज रोटी दूध भीगी और तू ! कंकड़, बासी खुला पिंजरा कि मिठुवा परदेशी अरे परेवा ! बोल, अब तोड़ मौन ढूँढ़, आखिर ये मिठुवा है कौन ?  धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

आदमी

आदमी घर - घर नहीं लगता तुम बिन बात कोई भी हो न ही कोई समझ सकता है  न ही किसी को समझाया जा सकता है तुम्हारे सिवा अच्छी तरह एक तू ही है जो विकास के एवरेस्ट से भी ऊपर कोई और जगह भाँप लेता है एक तू ही है जो घृणा का अतल समुद्र तल नाम लेता है एक तू ही है जो ईर्ष्या के औजार से भेद सकता है चीन की दीवार से मोटी और अभेद्य दिल की दीवार और झाँक लेता है यदि हम मान ले कहीं भगवान है तो उसका बाप है  लेकिन ये मत भूल संसार के जितने भी जानवर है उनमें से किसी एक का भी नाम भूल से तुम्हारे नाम के साथ न जोड़ पाना सबसे बड़ा पाप है।  कोई बात नहीं जो की जा सके तुमसे हटकर -हटाकर तू पुल है जो पसरा है संभव और असंभव के बीच एक पर पैर रख दूसरे को सिरहाना बना सही मायने में आदमी तू इस संसार का  सबसे बड़ा अजीब प्राणी है रे। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

हौसले

 हौसले  पहले भी था, है और रहेगा बाँध न पायेगी स्वार्थी जंजीरे धर्म की दीवारें और तुम्हारा काका परमाणु बम हम तो लगायेंगे नारे जिंदाबाद के  मुर्दाबाद के  लाठियाँ चलाओ चाहे गोलियाँ बरसाओ देखते हैं परिणाम  मारो, मारो जी भर कर मारो हौसले गरीबी के बुलंद है यारों। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

चिड़िया

 चिड़िया बेबस लाचार और हैरान थामना चाहती है शाखें पूरे इत्मिनान से जिद पर इच्छाएँ रचे, बसे, चहके मगर निगाहो-सी निगाहों में टिक नहीं पाती शाखें हवाओं की उग आयी है पाँखे हो चली है तेज गतियाँ - मतियाँ। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

आहवान

 आहवान तुम आओ मेरे साथ नहीं बनाऊँगा गौतम, गाँधी, भगतसिंग, आजाद नहीं सुनाऊँगा  गीता, बाइबिल या कुरान न ही कोई उपदेश मैं सिखाऊँगा प्रेम आत्मा परमात्मा के प्रति नहीं प्राणीमात्र के प्रति बनाऊँगा परिवार, समाज, देशहित आदमी नहीं बनने दूँगा दोपाया जानवर तुमहे। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

सूरज तुम्हे बोलना होगा

 सूरज तुम्हे बोलना होगा तुम्हारी किरण चूमेगी धरती का माथा खिल उठेंगे कलियों के होंठ मुंडेर पर कौंओ के बोल पाँखों की खुजलाहट खोल जायेंगे पट आगंतुक के स्वागत में चिड़ियों सी चहक उठेगी आँखे निखर आयेगा धरती का रूप  नहीं रोक पायेगी मुस्कान दूध पर खेलती बच्चियाँ कदाचित लौट आयेगी कल्पना लगा लेगी गले गुस्सा थूक कवि को उठ बैठेगी निशा चादर किनारे फेंक निकल पड़ेगी भोर जीवन की तलाश में  भोर की तलाश हो नियति की साँस हो धरती की आस हो जीवों का विश्वास तमस का त्रास हो पहुँचा सको न सको किसी मुकाम पर स्वयं को हर एक पड़ाव पर मगर नियति जीवन के लिए धरती के मन के लिए जन मन प्रण के लिए तिमिर शमन के लिए प्रकाश द्वार खोलना होगा सूरज तुम्हे बोलना होगा। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

अंधी

 अंधी नहीं थकती उनकी आँखे अंधकार को चीरते भार ढोते सपनों के जो कम नहीं और आँखों के सपनो से उँगलियों की पोर से छूकर देख लेती वह चेहरा अपना चेहरे पर छायी रौनक किसी भी मन को उलझा देने वाले सुलझे हुए बाल उगते सूरज से लाल गोल -गोल गाल और कुहनी तक खिलखिलाती  चुड़ियों की रंगत हथेलियों से टटोल वक्ष नाप लेती वह उफान जवानी का और गुनगुना लेती गीत बसन्त आगमन के लजा जाते दर्पण तारों से चक्क दाँत कभी कुछ सोचते में  भूलवश बिना बोले बढ़ा देता हूँ हाथ सिर सहलाने के लिए  भावी डर की नवजात आशंका से फट पड़ती आँखें खुले के खुले रह जाते होंठ काँपते  गूँज उठते स्वर - भैय्या ! क्योंकि वह जानती है चुप बढ़ते हाथ जितने घनिष्ठ होते हैं। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

विज्ञान

  विज्ञान  नयी - नयी तकनीकों अत्याधुनिक मशीनों के जन्मदाताओं तुम्हारी सोच कि दी हैं समाज को देश को  विकास की असीम संभावनाएँ कर लेती हैं आसानी से  मिल में मशीन दस आदमियों का काम मिनटों में कम्प्यूटर मानवीय क्षमता से परे गणनाएँ आगामी दिनों में  सूचना एवं प्रचार प्रसार की सीमाएँ लाँघ हो जाएगी घुसपैठ बच्चों की शिक्षा और बड़ों की यौन तुष्टि तक मैं जानता हूँ पर क्या  गीली मिट्टी के लोंदे से बच्चों को भावों की थपकी टीचर की ममता दे मानवता जल भर सके सुघट कुम्हार-सा बना पायेगा ?  प्रकृति परखना जो चाहे उंगलियों की टनटनाहट घातक न हो शिक्षा में शामिल हो धर्म और विज्ञान कर्म और निर्माण मर्म और निर्वाण स्वस्थ तन में स्वस्थ मन बसता है ज्ञान वही जो विकास रचता है चश्में केवल भ्रम पैदा कर सकते हैं बुद्धिजीवी होने का तकनीकों ने दी होती मानव को मानवता दस आदमियों की जगह  दस हाथों को रोजगार कुछ अंश ली होती दस परिवारों से किसी एक की भूख, गरीबी और मँहगाई का  भ्रष्टाचार, अनाचार, बलात्कार जैसे राक्षसों का नहीं होता जन्म लाचारी और कुण्ठा का होते हुए शिकार भू्रण हत्या के ...

चाह

 चाह तस्वीर बनाते - बनाते आदमी की मैं परेशान अभाव से  तलाश सतत जारी है भर दूँ वह रंग चाह परख न सके आदमी कम से कम इस एक जनमभर के प्रयास में हिंदू मुसलमाँ सिख ईसाई जिसने भी बनायी सुन्दर बनायी यूँ कला-कार को सधे मुग्ध हो सधे, बँधे न कि बँटे, हटे, छँटे लहू के रंग से रंग के एकात्म से एकात्म के विस्तार से। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

रामराज

 रामराज एक बच्चे की मौत पर  हाय - हाय करता सारा गाँव उदास चेहरा लिए श्मशान तक जाते गठरी हो चुकी बुढ़िया की अंतिम यात्रा में सुबह - सुबह सहज ही झुक जाता सिर जुड़ जाते हाथ मुँह से निकल पड़ता “राम-राम” पड़ोसी गाँव वाले या राह चलते अजनबी को देखते ही कोई देह नहीं ऐसी जिसके पसीने की बूंद बासमती बनकर न गिरी हो धरती के तन पर  गाँव की लाश पड़ी है आज इतिहास के चौराहे पर कटघरे में खड़े घर गवाही दे रहे हैं हाँ ये सच है !  बिल्कुल सच  मैने भी अपने छप्पर के नीचे  कई रात कई अजनबियों को पनाह दी है ये वही गाँव है जहाँ कभी शांति संतरी थी,  बंधे रहते सब  बंधुत्व की बेड़ियों से कोई हाथ कभी थका नहीं सहयोग के नाम पर ’रामराज’ ‘रामराज’ चिल्लाने वालों क्या तुम मेरा वह गॉव  लौटा सकते हो ? धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

बेटा

 बेटा  बेटा  बरसों पहले जिद कर बैठता चलते-टिमटिमाते तारे चाँद, उगता सूरज कभी हाथी के खिलौने के लिए। बाप पोंछता रहा नाक धोती के एक कोने से बार - बार शालीनता से देता रहा जवाब कई - कई बार दोहराने के बाद भी वही सवाल। किसी कोने पर रखी होती  मक्खियों से भिनभिनाती  दूध से भीगी नर्म रोटियाँ। आज, दो वक्त की रोटी एक अंगोछी के लिए तरसते बाप से दुहराना तो दूर  बात करना भी नहीं चाहता  वही एक बात को जानबूझकर कई बार पूछता था जो जब छोटा था। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

भूख

  भूख सपने देखती महलों के  दरवाजे पर जाते ही धर्म की मेज पर स्वार्थ की प्लेटों में परोसे देख, खून से चूरे भात नाक मुँह सिकोड़ते बार - बार लौट आती बासी को सींच - सींच पूस के आँगन में चिड़ियों सी फुदकती चॉव से खाती झोपड़ो में जन्मी पली जवान हो गयी है भूख।  धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

श्रद्धा

 श्रद्धा नहीं डालता मैं पानी सोचकर कि देवता हैं बस एक लालसा पुरखों की मेरे मेरी पीढ़ी के प्रति देता युगों-युगों रहे प्राण, दवा, शान्ति बहाना मात्र है पाषाणमूर्ति जिंदा रखने के लिए इस विशाल वृक्ष को धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

रजनी

रजनी जाड़े की दुशाले में  दुबकने लगती है रात ऊँघ जाती है दुनिया भिनसारी कसमसाहट में गुर्रा उठती है कुतिया बिलबिलाते पिल्लों के बीच कचरों के खखार सुन घर के पिछवाड़े में  तब भी नहीं मानती हार किनकिनाती उँगलियाँ झिंझोड़कर उठा लेती हैं पालीथीन, कागज और दफ्तियाँ पहुँचाकर पीठ पर लदी दूसरी दुनिया में फिर जाती हैं दबे पाँव  बिवाइयों से उकड़ाती रजनी और खो जाती है कहीं चुस्कियों के बीच तब आँखे मलते धीरे से उठकर चल पड़ता है सूरज रोजगार की तलाश में।    धर्मेन्द्र निर्मल   9406096346

सुनहले उजास के सपने

सुनहले उजास के सपने इसकी घर से निकलने की  देर रहती है नहीं होती देर छिलटों की छिलटई में बल्कि वे पहले से खड़े रहते हैं चैाक पर समय ताकते  नीलगिरि के पपड़ियाये छिलकों की तरह कोई तारीफ करता है, चाल की  कोई कहता चीज - कमाल की कोई फिकरा कसता है गाल पर, कोई बाल पर तो कोई मौन आमंत्रण देता है अपनी आँखों के स्वीमिंग ताल पर इन सबसे बचते  - बुचाते पहुँचते ही आफिस में सुनना पड़ता है- ‘देर कर दी आज’  - ‘क्या बात है ?’ देर हो न हो दबदबा दिखाने का हमदर्दी जताने का और प्यार के बहाने का कुर्सियाना अंदाज है यह। सहकर्मी समय को सुँघियाते हैं फाइलें झिंझोड़कर झाड़न ही सही काम तलाषते हैं इनके साथ करने को  चले आते हैं कुँकियाते माथा कुरेदने गर्म होने की चाह में, जैसे कुकुर बुझे  चुल्हे पर कुरेद कर बैठ जाते हैं।  पड़ोस से गुजरती है जब औरतों की नजरें दौड़ती है दरवाजे तक जैसे बच्चे दौड़ते हैं हेलीकाप्टर की आवाज सुन और इसे अपनी चर्चा में शामिल कर लेती है अपने - अपने पति के कान खींचती हैं इसमें से किसी को भी नहीं मालूम यह बेचारी इन अफवाहों, इन उलझनों की अंधेरी सुरंग से  कैसे...

इस छोटे से कमरे में

 इस छोटे से कमरे में सब कुछ सकेल ले गये हो तुम भावनाओं की भूख प्यास आँखों की मिटे ऐसा कुछ भी तो नहीं इस छोटे से कमरे में। नन्हीं गर्म चुलबुली धूप खिड़की से कूद मेरे गालों पर  खेलती है गौरैया सी गुदगुदाते मुस्कुराते कहती  गोया - गुडमार्निंग ! तुम मुझसे सटे इस छोटे से कमरे में। कहीं जाने से पहले खींचकर दर्पण बिलकुल तुम्हारी तरह तलाशता है मेरे चेहरे पर सिंदूर के धब्बे, कहीं बिंदी चैक जाते हैं कभी केश, कमीज पर देख मेरे ही टूटे इस छोटे से कमरे में। तेरे रूप रस से भीनी अजीब गंध  बिखर बिस्तर पर   बिखेर सपनों के संग तुम्हारी तरह करीब और करीब मुझे रखना चाहते हैं नींद से दूर छूटे इस छोटे से कमरे में। दरवाजे के आजू -  बाजू लटकाये जो तूने ग्रीटिंग कार्डों को जोड़ - जोड़ लटक रहा तुम्हारी बाली से  जैसे मुस्कुरा कर  कर रहीं तुम स्वागत झूमर तेरी नथनी मेरी नाक पर  अब -तब डटे इस छोटे से कमरे में। धर्मेन्द्र निर्मल   9406096346

उम्मीद

उम्मीद  अभी - अभी  यहाँ से गुजरा एक जानवर चालीस साल पहले  मेरे पूछे जाने पर कि कब तक बदल डालोगे दुनियाँ ? कहा था - ‘यही  कोई आधी सदी लगेगी।’ अब-जब मैंने जानना चाहा  चालीस साल बाद उसके आदमी से जानवर में तब्दील होने का कारण। मुरझाते मेरी आशा के बिरवे पर सींचते विश्वास जल  उसने मुस्कुराते हुए कहा - ‘बिरादर ही  बिरादर की भाषा समझता है।’ ‘हो न हो  इस दशक के अंत तक बदल जाये सिर्फ उम्मीद पर तो कायम है ये दुनियाँ।’ धर्मेन्द्र निर्मल  9406096346