सावधान !
सावधान !
मानवता
दुबकी बैठी है कमरे में
लाचारी की कुण्डी लगा
द्वार
खटखटा रही गरीबी
काँपते हाथों ।
हो गयी सूनी गलियाँ
राहतों की
गश्त लगाती है
उँची सेंडल पहनें
मौत मँहगाई की ।
आमसभा आयोजित करती /रोज
कहीं न कहीं
धरने पर बैठती
बिमारियाँ।
चीथते चैराहे पर
चील कौअें सत्य -शव
पता नहीें
पाप या पुण्य से
माँग रहा मौत या जिंदगी
मगर गिड़गिड़ा रहा है धर्म कुछ।
स्वार्थी श्रध्दालुओं की भीड़ बेकाबू
सीखते -सीखते तैरना
तरने तारने लगे
बारहों मास कुंभ मेले में
झूठ भ्रस्टाचार फरेब संगम पर।
इठला रहा है भय
अपनी अशेष जवानी पर
हो चुका पसीना श्रम पर मेहरबान
जब से टाँगा है दरवाजे पर
सुविधाओं ने बोर्ड
’कुत्ते से सावधान।’
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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