बढ़ता शहर
बढ़ता शहर
इस छोर से
उस छोर तक
फैल रहे परिसर लगातार
सूँड से
नित नये निकल रहे
चक्क से दूधिया दाँत
सफेद भवनों के
काले जादुओं के
एक से एक
कारनामों से
दिन ब दिन
विशालकाय होता
आम लोगो पर
भारी पड़ता जा रहा
मेरे कस्बे का हाथी।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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