दुःख और जिन्दगी

 दुःख और जिन्दगी

दुःख से 

भाग रही होती जिन्दगी

हो जाती कई भाग,

दुःख से 

पीछा छुड़ाने बहा रही होती जल

जल जाती खुद जिंदगी,

जिंदगी

खुद को छिपाने बनाती खोल

मुस्कराहटों की 

खोल जाते पोल

आँखों से दुख

दुःख 

कल था आज है रहेगा कल भी

भटक रही जिंदगी

आज कल की तलाष में

जिंदगी

थककर खड़ी हो जाती 

भीत की तरह भयभीत

दौड़ते-दौड़ते उम्रभर

भर जाते दौड़ते-दौड़ते

 दौड़ती छिपकलियों की तरह

खचाखच दुःख

जिंदगी में।।






धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346


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