हम और तुम

  हम और तुम

गाँठे भर आयी है 

चल चलकर नंगे पाँव 

पत्थर तोड़ते भर आए हैं मसल।


मसलना तो दूर 

नहीं रहेगा मसलन भी शेष

हमारी छूअन मात्र से।

 

मगर, हम हम हैं

तुम तुम हो

नहीं चल सकते नंगे पाँव तुम

डगभर मंदिरो के फर्श पर भी ।


बस मसलना जानते हो 

निर्दोष फूलों को

तलुआ चाँटते जूतों के नाल से।



धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346


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