प्रतीक्षा

 प्रतीक्षा

काश! झरोखे से झाँक लेती

एकाध दिन 

चंद पल ही सही 

मेरी कुटिया कितनी वीरान है तुम बिन

प्रतीक्षा में परछट के सर झुके-झुके है 

बिलकुल मौन मानो लाश ढो रहे हैं


सच बताऊँ

तुम्हारा साया सिमेट पोटली में बाँध लेता

निहारता सुबह शाम टाँगकर किसी खूँट में

बिकती बाजार में खरीद लेता मैं

टेबल दीवारों पर्दों में सजा लेता तुम्हें

मगर पता नहीं स्वार्थी दीवारों के बीच ही

कैद रहना क्यों भाता है तुम्हें


देखना एक दिन गिर जायेगी दीवार

बज्र बन कर गिरेगी प्रेम की मार

खण्डहर हो जायेगा नफरती महल 

मेरी कुटिया में होगी चहल-पहल 

तब तुम दौड़कर भीड़ को चीरती

मेरे सामने आओगी

बिलकुल सामने 

और मुझसे लिपट जाओगी 


ए खुशी!

मुझे उसी दिन की प्रतीक्षा है।।



धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346


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