मेरा मन
मेरा मन
समाँ में पसरी हवा
काँटे से चीरती है
झीनी चादर-से
भीगो कर पलकें
सर्द हो जाती है
कली की मुस्कान खातिर
उदास जिन्दगी
नहीं मालूम
तुम्हें
हँसते देखने के लिए
रोज इसी तरह
बिंधता है
मेरा मन।।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
मेरा मन
समाँ में पसरी हवा
काँटे से चीरती है
झीनी चादर-से
भीगो कर पलकें
सर्द हो जाती है
कली की मुस्कान खातिर
उदास जिन्दगी
नहीं मालूम
तुम्हें
हँसते देखने के लिए
रोज इसी तरह
बिंधता है
मेरा मन।।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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