विषाद

 विषाद 


हर्ष के विरोध में खड़ा

विषाद

कितना सुखद है 

डाँट पीकर भी

बुजुर्गों के क्रोध पर 

जिद के पैर पटकता बच्चे जैसा

जंगल के उजाड़ के बाद

घर परिवार समाज संसार

यहाँ तक कि खुद से टूटकर जब 

पनाह के फिराक में कोई परिंदा

जहाँ भी सर छिपाना चाहे

दुत्कारा जाय

वह थक-हार कर भी उड़ने आकाष में

आतुर फड़फड़ायेगा

और निश्चित नयी शक्ति के साथ

ऊँचा और ऊँचा

उड़ेगा दूर बहुत दूर

सच विषाद

जीवन के लिए तुम

स्पेशल टाॅनिक हो।।



धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346


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