शीर्षक
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अक्सर लोग/रोज की भी
देखी सुनी
जानी पहचानी
गुजरी परखी
बातों चीजों व घटनाओं को
रखते चले जाते है
स्मृति के हाशिए पर
कोई कोई होता है ऐसा
जो उन्हें
हाशिए से निकाल
देता है स्थान
समय के पन्नों पर
शीर्षक
ऐसे ही बनते है।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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