इतिहास की सड़कों पर
इतिहास की सड़कों पर
लद गये हैं दिन धूल से
पन्नों -सी कैलेण्डर के
फड़फड़ा रहीं विचार -शाखें
तारीखें रफ्तार से
आ जा रही
मोटर गाडि़यों की तरह
कोई चारा नहीं
अलावा आँख मींचने के
इतिहास की सड़कों पर आदमी
रह गया है -ठक्क से
पंथ छोर पेड़ सा।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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