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Showing posts from January, 2022

भीड़

 भीड़ ये भीड़ है बाबू, नासमझ भीड़ भीड़ जानती हैं सिर्फ पत्थर को पूजना पत्थर से मारना पत्थर हो जाना और, पत्थर पर नाम खुदवाना चीखोगे, चिल्लाओगे नही सुनने वाले समझाना चाहोगे नहीं बूझने वाले चुपचाप चलोगे नहीं गुनने वाले हाँ, पागल कहकर पत्थर जरूर मारेंगे तुम चाहते हो आदमी, आदमी बना रहे मेरी मानो ! बैठ जाओ कहीं भी पत्थर होकर। धर्मेन्द्र निर्मल  भिलाईनगर 9406096346

साहसी

 साहसी   तुम साहसी हो साहेब लड़ते नहीं थकते सोते - जागते उठते - बैठते खड़े हो - होकर बैठने के लिए समाज से, देश से , जिंदगी से जिंदगी भर। जिंदगी से जिंदगी भर हम लड़ते हैं बालिश्त पेट के लिए सो जाते हैं जब थकते हैं। धर्मेन्द्र निर्मल  भिलाईनगर 9406096346

राखी

 राखी  आ बाँधू तुम्हे राखी। बाँधू भैया तुम्हे राखी।। जीवन किस्मत का पासा है, सदा रहोगे आशा है,  सुख दुख में मेरे साथी।। कदम कहीं डगमग डोले, कँधे के नीचे आ हौले, जाओगे बन बैसाखी।। फँस जाऊँ किसी उलझन में,  दुनियाँ के विशाल गगन में, दोगे दिशा दिखा झाँकी।। बाँध रही हूँ स्नेह पूरित, करती रहे नित अंकुरित,  प्रेम  हृदय में राखी।। कच्चे धागे में भाई,  सुसज्जित हुई कलाई,  उर निधि सौगात राखी।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

राजा रानी

 राजा रानी एक राजा एक रानी एक का भाई मंत्री एक का कोतवाल खजाने का पूरा माल काले से काला लहू से लाल जिनके रक्षक यक्ष सवाल बच्चे! बढ़कर एक एक से बड़े कमाल के  कोई हमाल से कोई दलाल से नमक हलाल से सबके सब झखमार बटमार लठमार।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

पानी का मोल

  पानी का मोल    पूछिए उस औरत से  पानी का मोल जो हमाम में घुसी बैठी है देह पर साबुन लगाये बाल बजबजा रहे हैं जिनके शैम्पू के झाग से और नल से पानी नदारद है। पानी का मोल  बर्तन माँजती औरत से पूछिए उस औरत से  जिसे धोने हैं अभी  ढेरों बर्तन घिसनी है अभी टिकिया फिर छपक-खंगाल ओसरी-पारी बाल्टी दर बाल्टी डूबो उजियारने है कपड़े घर भर के  और जिनके बर्तन खड़े  हैं पारी की बाट जोहते हवा से गुड़गुड़ी खेलते नल के पास नल का मुँह ताकते उँगली चूसते बच्चे की तरह। उस औरत से पूछिए  पानी का मोल जो माथे पर आये पानी के बूंदो को  भूल, लगातार झूल-झूल पोंछा लगा रही है साफ और दाँत से चक्क फर्श को  और और चमकाने जिनके कानों में गूँज रही है लगातार पीछे छोड़ आये घर में भूखे, अधनंगे बच्चों के रोने की आवाजें और आँखों में लटक रहा  घर का भविष्य - ताला बन। पूछिएगा उस औरत से  पानी का मोल जिसे चाहिए पानी धोने के लिए चाँवल राँधकर भात - साग परोसकर संतुलित आहार भरने के लिए पेट परिवार का भरनी है अभी गुंडियाँ चलना है अभी शेष दूर तक चिलकती धूप में जहाँ हवा चलने ...

माँ का मन

 माँ का मन बिन पेंदी का लोटा माँ का मन। वरना फड़फड़ाकर गिर पड़ेगी अधीर माँ बच्चा आँखों में होना। बच्चा मुस्कुराया नहीं कि खिल उठी माँ बच्चा बुदबुदाया नहीं कि  बोल उठी माँ लड़खड़ाया नहीं कि  दौड़ पड़ी चिल्लाते ढुलक आये पलकों पर कंचन के कंचों को झटपट आँचल में समेट समझाने बैठ गयी माँ - बेटा ! ऐसा नहीं करते वैसा नहीं करते, बेटा ! सचमुच पागल सी होती है माँ। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

माँ का जीवन

 माँ का जीवन  रात सारी माँ की  आँखों में कटती है जाने कब कंस काली कोठरी में आ धमके। सुबह बच्चे को स्कूल भेजते वक्त मुँह पे आ जाता है कलेजा देखकर भयानक कलजुगी वाचाल चेहरा गूंगे अखबारों का। मन को मथते माथे को कुरेदते घुमड़ती रहती है पूरे दिन चिंताओं की भीड़  कि मेरा नयनाभिराम किसी से लड़ तो नहीं रहा होगा ? और मेरी कोमलांगी सीता ? हाय राम ! पता नहीं कब कहाँ क्या घट जाए बढ़ रहे हैं दिन - ब - दिन रक्तबीज से यहाँ दशानन - दुशासन। जैसे - तैसे आती है ढलान पर शाम सुनकर घण्टी की आवाज जब दरवाजा खोलती है माँ देखते ही अपनी आँखों के तारे को सीने से लगा पा लेती है गोद में भरपूर सतयुग। न जाने दिन भर में  इस तरह  कितने जुग जी लेती है माँ। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

जंगल

 जंगल बचपन में  जंगल का नाम सुनकर  काँपता था मैं। किताबों में पढ़ी थी मैंने सुना भी था जंगल में शेर, चीते, भालू रहते हैं जो बड़े क्रुर और हिंसक होते है। अब सिर्फ मैं ही नहीं  दुनिया काँपती है जंगल के नाम से सुना है शेर, चीते, भालू नहीं रहते  अब वहाँ इंसानों का डेरा है।  धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

होशियार चुनें

 होशियार चुनें आओ हम सब मूरख मिलकर  कोई एक अधिक होशियार चुनें जो भर सके पेट काटकर निवाला अपने-अपनो का अपनो को बाँट सके जो धूप - छाँव हवा - पानी बादल - बारिश देश - दुनियाँ बखत परे साँसे भी। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

प्यासी अँखियाँ

 प्यासी अँखियाँ अँखियाँ, दरस की प्यासी अँखियाँ। बतिया, करे मन तेरी ही बतिया।। चाहे रहे न रहे ये जीवन लागी है तुमसे जो लगन रसिया, जाए कहाँ मन रसिया।। बंद करूँ भीतर हो समाए खोलूँ तो बाहर मुसुकाए अँखियाँ, सूरत बसे मेरी अँखियाँ।। डर नहीं अब अंत आदि का आस लगी बस परसादी का खुशियाँ, वारूँ मैं सारी खुशियाँ।। सावन के झूले भरमाए कोयल संग बसंत लुभाए नदियाँ, मिलन को बहती मैं नदियाँ।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

अभी अभी

अभी अभी अभी अभी बहस शुरू हुई है बस चलने ही वाला है कोई आंदोलन  अमल में आने वाली है कोई नई योजना फूटने ही वाली है क्रांति कहीं बस ! आने ही वाले अच्छे दिन ऊँची हो रही है नाक भारत की एकाग्र-व्यग्र देश मुँह बाए ताक रहा है सूरज की ओर झाँक रहा है ऊपर - नीचे दाएं - बाएं जैसे अब आये तब आये  और एक सुकुन पसरे मगर छींक है कि आने से रही। सो रही। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346