भीड़
भीड़ ये भीड़ है बाबू, नासमझ भीड़ भीड़ जानती हैं सिर्फ पत्थर को पूजना पत्थर से मारना पत्थर हो जाना और, पत्थर पर नाम खुदवाना चीखोगे, चिल्लाओगे नही सुनने वाले समझाना चाहोगे नहीं बूझने वाले चुपचाप चलोगे नहीं गुनने वाले हाँ, पागल कहकर पत्थर जरूर मारेंगे तुम चाहते हो आदमी, आदमी बना रहे मेरी मानो ! बैठ जाओ कहीं भी पत्थर होकर। धर्मेन्द्र निर्मल भिलाईनगर 9406096346