धरती से
धरती से
कहते हैं
भावनाओं के हाथ पैर नहीं होते
अभिव्यक्ति को शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती
पे्रम को परिभाषित नहीं किया जा सकता
वह कहने की नही एहसास की वस्तु है
इसीलिए अनकहे प्यार-सा अमरत्व
देवताओं में भी नहीं
मैं भी नहीं चाहता कहना
पे्रमियों की तरह
आई लव यू
बस याद कर रहा हूँ
तेरी अमर साँस से साँस हरी है
तुझे खा-खेलकर बचपन भरा है
चीर कर तेरी छाती पेट भरा है
वह तेरी ही छाती है जिसने पनाह दी है
जब कोई मरा है
यहाँ तक कि शब्द इतिहास और समय भी
किसी का भी जीना संभव न हो सका
तेरे बिना तुमसे दूर
पीढियाँ गुजर गयी
सोचता हूँ तेरा यह बंधन
तेरा यह प्यार
किस तरह का है माँ।।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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