धरती का राजकुमार
धरती का राजकुमार
चंचल शरारती हवाओं ने
तेरी काली घनी जुल्फों को छेड़ा
मयूर हुआ मन मेरा
प्रणय भार से झुकी तेरी पलकें
आतुर तुम्हे कसने
गिरि के महापेड़ों-सी उठी मेरी बाँहें
तेरी बिंदिया चमकी कि
उछाहों की असीम तरंग लिए
अंतहीन भावी सपनों के उथल-पुथल बीच
महासागर में तब्दील हुआ
मेरा हृदय
मेरा अनकहा प्रेम
मेरे होंठों की प्यास
भारी पड़ी तुम्हारी मौन स्वीकृति पर
तुमने बरसा दी
कड़ककर, गरजकर, उमड़-घुमड़
प्रेम, प्रेम और प्रेम
और भीगता चला गया
मैं मेरा तन अंतर्मन
ये सावन की मतवाली घटा
तू आसमाँ की राजकुमारी है
तो मै धरती का राजकुमार।।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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