भटकाव
भटकाव
मैने देखा है तराजू के पलड़ों को
बराबर होते हैं जब
जरूरत नहीं पड़ती
बाट चढ़ाने की न सामान उतारने की
टिक जाती सुई
जैसे दुनिया टिकी है अपनी जगह
लोग कहते हैं - मर गई मानवता
झूठ और पाप के जहर से
दिन ब दिन भारी
होता जा रहा पैसे का पलड़ा
माना मानवता हो गयी रूई सी
पर्दे के पीछे जा छिपा सत्य
घूसखोरी जमाखोरी नशाखोरी की मार से
मँहगाई के डर से
पहनकर मुखौटा बिचौलियों के हाथों
बित्ता भर पेट खातिर
इंसान बिकता है
ईमान बिकता है
पर क्यों भागता है आदमी
सुख के पीछे आखिर
क्यों पराये भी अपने से लगते हैं
बिकता नहीं बाजार में
नहीं मिलता हजारों कीमत पर
माता, पिता और आत्मीय स्नेह।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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