मिठुवा

  मिठुवा

रहे सब जन - जन

दड़बों में गुटरगुँ करते

इसीलिए खुले, छोड़े कि

जाओगे कहाँ, ठहरे परवशी

ठौर आओगे परेवा फिर इसी

मिट्ठू मियाँ मितभाषी मुक्ताकाशी

खा रहा रोज रोटी दूध भीगी

और तू ! कंकड़, बासी

खुला पिंजरा कि मिठुवा परदेशी

अरे परेवा ! बोल, अब तोड़ मौन

ढूँढ़, आखिर ये मिठुवा है कौन ? 




धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

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