मैंने देखा है ईश्वर को
मैंने देखा है ईश्वर को
मैंने देखा है ईश्वर को
ये मत पूछ कब और कहाँ
पर हाँ ! मैंने देखा है ईश्वर को
तिल से ताड़ तक, राई से पहाड़ तक
कचरों के ढेर में, यानों की टेर में
धरती के कण - कण में
युग -युग के क्षण - क्षण में
सागर के नीचे, आसमान के ऊपर
क्षितिज के छोर तक जब - जब झाँका है
आँका अमूल्य रचना संसार को
मैंने देखा है ईश्वर को
जीवन को जीते सलवटों में
युग को बदलते करवटों में
मृत्यु को पछाड़ते, रोगों को झाड़ते
बारिश में भीगते, शीत में ठिठुरते
तपन को तार - तार स्वेद से करते
तोड़ते घुटनों पर नियति निठुर को
मैंने देखा है ईश्वर को
पत्थरों को तोड़ते, नदियों को मोड़ते
स्वार्थी मनुजों के लिए
धरती से अंबर को गारों से जोड़ते
जोड़ते कुर्सिंयाँ, जोड़ते सरकार को
करके मुहैया सुविधा संसार को
खाकर चटनी, नून संग बासी
घट - घट के वासी
झोपड़ी में लेते है खट्टी डकार को
मैंने देखा है ईश्वर को
निर्मोही बच्चों की निश्छल किलकारी में
निर्मम जग में खटती महतारी में
पग पग पर जूझते पिता के प्यार में
अकारण रूठने पर भी बहन की मनुहार में
अपने पराए गिरे पड़े बिछुड़े
पिछड़े दीन दुखियों के हृदय में उलीचते
स्नेह की धार को
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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