आदमी
आदमी
घर - घर नहीं लगता तुम बिन
बात कोई भी हो
न ही कोई समझ सकता है
न ही किसी को समझाया जा सकता है
तुम्हारे सिवा अच्छी तरह
एक तू ही है
जो विकास के एवरेस्ट से भी ऊपर
कोई और जगह भाँप लेता है
एक तू ही है जो
घृणा का अतल समुद्र तल नाम लेता है
एक तू ही है
जो ईर्ष्या के औजार से भेद सकता है
चीन की दीवार से मोटी और अभेद्य
दिल की दीवार और
झाँक लेता है
यदि हम मान ले कहीं भगवान है
तो उसका बाप है
लेकिन ये मत भूल
संसार के जितने भी जानवर है
उनमें से किसी एक का भी नाम
भूल से तुम्हारे नाम के साथ न जोड़ पाना
सबसे बड़ा पाप है।
कोई बात नहीं जो की जा सके
तुमसे हटकर -हटाकर
तू पुल है जो पसरा है
संभव और असंभव के बीच
एक पर पैर रख दूसरे को सिरहाना बना
सही मायने में आदमी
तू इस संसार का
सबसे बड़ा अजीब प्राणी है रे।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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