प्रेम
प्रेम
बया ही होता है जन्मजात वास्तुशास्त्री
पावस की उन्माद में रचाता स्वयंवर
बबूल की डाल पर सौन्दर्य की आस्था ले
झूलता एक ताजमहल
हवा के गीत पर
झींगुर संगीत पर
थिरकती फसलें
होता जीवन मधुबन
भूखी श्री भाव की
सम्मोहित हो विराजती
नहीं तो फिर वही ताजमहल
फिर वही स्वयंवर में
दखलंदाजी तो होती
देव रहे न रहे
मंदिर मंदिर होता है
क्यों न हो सूना आखिर
प्रेम में सौन्दर्य होता है।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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