अंधी

 अंधी

नहीं थकती उनकी आँखे

अंधकार को चीरते

भार ढोते सपनों के

जो कम नहीं और आँखों के सपनो से

उँगलियों की पोर से छूकर

देख लेती वह चेहरा अपना

चेहरे पर छायी रौनक

किसी भी मन को उलझा देने वाले

सुलझे हुए बाल

उगते सूरज से लाल गोल -गोल गाल

और कुहनी तक खिलखिलाती 

चुड़ियों की रंगत

हथेलियों से टटोल वक्ष

नाप लेती वह उफान जवानी का

और गुनगुना लेती गीत

बसन्त आगमन के

लजा जाते दर्पण तारों से चक्क दाँत

कभी कुछ सोचते में

 भूलवश बिना बोले

बढ़ा देता हूँ हाथ

सिर सहलाने के लिए 

भावी डर की नवजात आशंका से

फट पड़ती आँखें

खुले के खुले

रह जाते होंठ काँपते 

गूँज उठते स्वर - भैय्या !

क्योंकि वह जानती है

चुप बढ़ते हाथ

जितने घनिष्ठ होते हैं।


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

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