भूख

  भूख

सपने देखती महलों के 

दरवाजे पर जाते ही

धर्म की मेज पर स्वार्थ की प्लेटों में

परोसे देख, खून से चूरे भात

नाक मुँह सिकोड़ते

बार - बार लौट आती

बासी को सींच - सींच

पूस के आँगन में

चिड़ियों सी फुदकती

चॉव से खाती

झोपड़ो में जन्मी पली

जवान हो गयी है भूख। 


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

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