रामराज
रामराज
एक बच्चे की मौत पर
हाय - हाय करता सारा गाँव
उदास चेहरा लिए श्मशान तक जाते
गठरी हो चुकी बुढ़िया की अंतिम यात्रा में
सुबह - सुबह सहज ही झुक जाता सिर
जुड़ जाते हाथ
मुँह से निकल पड़ता “राम-राम”
पड़ोसी गाँव वाले
या राह चलते अजनबी को देखते ही
कोई देह नहीं ऐसी जिसके पसीने की बूंद
बासमती बनकर न गिरी हो
धरती के तन पर
गाँव की लाश पड़ी है आज
इतिहास के चौराहे पर
कटघरे में खड़े घर गवाही दे रहे हैं
हाँ ये सच है !
बिल्कुल सच
मैने भी अपने छप्पर के नीचे
कई रात कई अजनबियों को पनाह दी है
ये वही गाँव है जहाँ कभी
शांति संतरी थी,
बंधे रहते सब
बंधुत्व की बेड़ियों से
कोई हाथ कभी थका नहीं
सहयोग के नाम पर
’रामराज’ ‘रामराज’ चिल्लाने वालों
क्या तुम मेरा वह गॉव
लौटा सकते हो ?
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
Comments