बरगद
बरगद
बरगद की जड़ से जड़ें जमाए
अब भी वहीं खड़ा है मेरा गाँव
अब भी वही लगता है चौपाल
सुबह - शाम
घर आँगन में फुदकने वाली गौरैया
मद-होश गहारती है
पात - पक्ष में
बद में भी हवा आस नहीं छोड़ती
बरगद की जड़े हिला देने की
तोते भी टर्राने से
नहीं आते बाज
बाज भी आकर कभी कभार
मार जाता है चोंच
आपस में लड़ते गिलगिलैयों के घोसलों पर
इन चिल्लपों से बेपरवाह
ताकते सफेद बगुले
ऊपरी शाख।
बरगद के नीचे बापू के सपने की फाइल लिए
खड़ा है पंचायत भवन
और बगल में हैंडपंप
पूरी तरह प्रतिबद्ध
बूंद - बूंद रक्षा के लिए।
छत की मुंडेर पर कौअे भी
मुँहफाड़े गुमताड़ा लगाते हैं
किसी नजूल या अनजूल टहनी पर
नाजायज अधिकार के लिए
और पंचायत भवन के दरवाजे पर टंगा ताला
रोज मुनादी करता है
पंचायत होने की
जिसे सुनती है
केवल दीवार पर टंगी बापू की
मूक मौन तस्वीर
और दीवारें दुहराती है बापू का कथन -
बूरा मत देखो, बूरा मत सुनो, बूरा मत करो।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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