सुनहले उजास के सपने
सुनहले उजास के सपने
इसकी घर से निकलने की
देर रहती है
नहीं होती देर
छिलटों की छिलटई में
बल्कि वे पहले से खड़े रहते हैं चैाक पर
समय ताकते
नीलगिरि के पपड़ियाये छिलकों की तरह
कोई तारीफ करता है, चाल की
कोई कहता चीज - कमाल की
कोई फिकरा कसता है गाल पर,
कोई बाल पर
तो कोई मौन आमंत्रण देता है
अपनी आँखों के स्वीमिंग ताल पर
इन सबसे बचते - बुचाते
पहुँचते ही आफिस में सुनना पड़ता है-
‘देर कर दी आज’
- ‘क्या बात है ?’
देर हो न हो
दबदबा दिखाने का
हमदर्दी जताने का
और प्यार के बहाने का
कुर्सियाना अंदाज है यह।
सहकर्मी समय को सुँघियाते हैं
फाइलें झिंझोड़कर झाड़न ही सही
काम तलाषते हैं
इनके साथ करने को
चले आते हैं कुँकियाते
माथा कुरेदने
गर्म होने की चाह में,
जैसे कुकुर बुझे चुल्हे पर
कुरेद कर बैठ जाते हैं।
पड़ोस से गुजरती है जब
औरतों की नजरें दौड़ती है दरवाजे तक
जैसे बच्चे दौड़ते हैं
हेलीकाप्टर की आवाज सुन
और इसे अपनी चर्चा में शामिल कर लेती है
अपने - अपने पति के कान खींचती हैं
इसमें से किसी को भी नहीं मालूम
यह बेचारी
इन अफवाहों, इन उलझनों की अंधेरी सुरंग से
कैसे गुजरती है
सुनहले उजास के सपने के लिए।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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