रजनी
रजनी
जाड़े की दुशाले में
दुबकने लगती है रात
ऊँघ जाती है दुनिया
भिनसारी कसमसाहट में
गुर्रा उठती है कुतिया
बिलबिलाते पिल्लों के बीच
कचरों के खखार सुन
घर के पिछवाड़े में
तब भी नहीं मानती हार
किनकिनाती उँगलियाँ
झिंझोड़कर उठा लेती हैं
पालीथीन, कागज और दफ्तियाँ
पहुँचाकर पीठ पर लदी दूसरी दुनिया में
फिर जाती हैं दबे पाँव
बिवाइयों से उकड़ाती रजनी
और खो जाती है कहीं चुस्कियों के बीच
तब आँखे मलते
धीरे से उठकर
चल पड़ता है सूरज
रोजगार की तलाश में।
धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346
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