चाह

 चाह

तस्वीर बनाते - बनाते आदमी की मैं

परेशान अभाव से 

तलाश सतत जारी है

भर दूँ वह रंग

चाह

परख न सके आदमी

कम से कम

इस एक जनमभर के प्रयास में

हिंदू मुसलमाँ सिख ईसाई

जिसने भी बनायी

सुन्दर बनायी

यूँ कला-कार को सधे

मुग्ध हो सधे, बँधे

न कि बँटे, हटे, छँटे

लहू के रंग से

रंग के एकात्म से

एकात्म के विस्तार से।


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

Comments

Popular posts from this blog

जातिवाद

होशियार चुनें

हम और तुम