सूरज तुम्हे बोलना होगा
सूरज तुम्हे बोलना होगा
तुम्हारी किरण चूमेगी धरती का माथा
खिल उठेंगे कलियों के होंठ
मुंडेर पर कौंओ के बोल
पाँखों की खुजलाहट
खोल जायेंगे पट आगंतुक के स्वागत में
चिड़ियों सी चहक उठेगी आँखे
निखर आयेगा धरती का रूप
नहीं रोक पायेगी मुस्कान
दूध पर खेलती बच्चियाँ
कदाचित लौट आयेगी कल्पना
लगा लेगी गले गुस्सा थूक कवि को
उठ बैठेगी निशा
चादर किनारे फेंक
निकल पड़ेगी भोर जीवन की तलाश में
भोर की तलाश हो
नियति की साँस हो
धरती की आस हो
जीवों का विश्वास
तमस का त्रास हो
पहुँचा सको न सको
किसी मुकाम पर स्वयं को
हर एक पड़ाव पर मगर
नियति जीवन के लिए
धरती के मन के लिए
जन मन प्रण के लिए
तिमिर शमन के लिए
प्रकाश द्वार खोलना होगा
सूरज तुम्हे बोलना होगा।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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