बेटा

 बेटा 

बेटा 

बरसों पहले जिद कर बैठता

चलते-टिमटिमाते तारे

चाँद, उगता सूरज

कभी हाथी के खिलौने के लिए।

बाप

पोंछता रहा नाक धोती के एक कोने से

बार - बार

शालीनता से देता रहा जवाब

कई - कई बार

दोहराने के बाद भी

वही सवाल।

किसी कोने पर रखी होती 

मक्खियों से भिनभिनाती 

दूध से भीगी नर्म रोटियाँ।

आज, दो वक्त की रोटी

एक अंगोछी के लिए तरसते बाप से

दुहराना तो दूर 

बात करना भी नहीं चाहता 

वही

एक बात को जानबूझकर

कई बार पूछता था जो

जब छोटा था।


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

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