माँ का जीवन

 माँ का जीवन 


रात सारी माँ की

 आँखों में कटती है

जाने कब कंस

काली कोठरी में आ धमके।


सुबह बच्चे को स्कूल भेजते वक्त

मुँह पे आ जाता है कलेजा

देखकर भयानक कलजुगी वाचाल चेहरा

गूंगे अखबारों का।


मन को मथते

माथे को कुरेदते

घुमड़ती रहती है पूरे दिन

चिंताओं की भीड़ 

कि मेरा नयनाभिराम

किसी से लड़ तो नहीं

रहा होगा ?

और मेरी कोमलांगी सीता ?

हाय राम !

पता नहीं कब कहाँ

क्या घट जाए

बढ़ रहे हैं दिन - ब - दिन

रक्तबीज से यहाँ

दशानन - दुशासन।

जैसे - तैसे आती है

ढलान पर शाम

सुनकर घण्टी की आवाज

जब दरवाजा खोलती है माँ

देखते ही

अपनी आँखों के तारे को

सीने से लगा

पा लेती है गोद में

भरपूर सतयुग।


न जाने दिन भर में 

इस तरह 

कितने जुग जी लेती है माँ।


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346


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