माँ का मन

 माँ का मन


बिन पेंदी का लोटा

माँ का मन।


वरना फड़फड़ाकर गिर पड़ेगी

अधीर माँ

बच्चा आँखों में होना।


बच्चा मुस्कुराया नहीं कि

खिल उठी माँ

बच्चा बुदबुदाया नहीं कि 

बोल उठी माँ

लड़खड़ाया नहीं कि 

दौड़ पड़ी चिल्लाते

ढुलक आये पलकों पर

कंचन के कंचों को

झटपट आँचल में समेट

समझाने बैठ गयी

माँ - बेटा !

ऐसा नहीं करते

वैसा नहीं करते, बेटा !


सचमुच पागल सी

होती है माँ।


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346


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