प्यासी अँखियाँ
प्यासी अँखियाँ
अँखियाँ, दरस की प्यासी अँखियाँ।
बतिया, करे मन तेरी ही बतिया।।
चाहे रहे न रहे ये जीवन
लागी है तुमसे जो लगन
रसिया, जाए कहाँ मन रसिया।।
बंद करूँ भीतर हो समाए
खोलूँ तो बाहर मुसुकाए
अँखियाँ, सूरत बसे मेरी अँखियाँ।।
डर नहीं अब अंत आदि का
आस लगी बस परसादी का
खुशियाँ, वारूँ मैं सारी खुशियाँ।।
सावन के झूले भरमाए
कोयल संग बसंत लुभाए
नदियाँ, मिलन को बहती मैं नदियाँ।।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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