पानी का मोल

 


पानी का मोल 

 

पूछिए उस औरत से 

पानी का मोल

जो हमाम में घुसी बैठी है

देह पर साबुन लगाये

बाल बजबजा रहे हैं जिनके

शैम्पू के झाग से

और नल से पानी नदारद है।



पानी का मोल 

बर्तन माँजती औरत से पूछिए

उस औरत से 

जिसे धोने हैं अभी

 ढेरों बर्तन

घिसनी है अभी टिकिया

फिर छपक-खंगाल ओसरी-पारी

बाल्टी दर बाल्टी डूबो

उजियारने है कपड़े घर भर के 

और जिनके बर्तन खड़े  हैं

पारी की बाट जोहते

हवा से गुड़गुड़ी खेलते

नल के पास

नल का मुँह ताकते

उँगली चूसते बच्चे की तरह।


उस औरत से पूछिए 

पानी का मोल

जो माथे पर आये पानी के बूंदो को 

भूल, लगातार झूल-झूल

पोंछा लगा रही है

साफ और दाँत से चक्क फर्श को 

और और चमकाने

जिनके कानों में गूँज रही है लगातार

पीछे छोड़ आये घर में

भूखे, अधनंगे बच्चों के

रोने की आवाजें

और आँखों में लटक रहा 

घर का भविष्य - ताला बन।


पूछिएगा उस औरत से 

पानी का मोल

जिसे चाहिए पानी

धोने के लिए चाँवल

राँधकर भात - साग

परोसकर संतुलित आहार

भरने के लिए पेट परिवार का

भरनी है अभी गुंडियाँ

चलना है अभी शेष

दूर तक

चिलकती धूप में जहाँ

हवा चलने से भी थर्राती है।


मत पूछिए 

पानी का मोल 

मर्द क्या बता पायेगा

जिसे बस पीने-खाने के लिए

पानी की जरूरत होती है

अपनी आँखों में दुनिया भर का

पानी लिए पानी के लिए

तरसती औरत से बेहतर

कौन समझ सकता है भला ?

पानी का मोल।


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346


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