राजा और प्रजा
राजा और प्रजा
सत्य को जानना, समझना
और परखना हो तो
राजा का चेहरा देख लो।
राज का चहुमुखी विकास
देखना हो तो
राजा के ठाठ-बाट देख लो।
राजा के हर एक बात-व्यवहार में
देश की संस्कृति झलकती है
एक राजा ही तो है
जिसके चाल-ढाल में
संस्कृति पनपती-पलती है।
राजा कभी झूठ नहीं बोलता
उसकी कथनी -करनी में
रत्ती भर भी
अंतर नहीं होता।
उसके मुँह में जड़े सोने के दाँत
खाने के नहीं हैं
और न ही दिखाने के हैं
वे तो सिर्फ और सिर्फ
चबाने और दबाने के हैं
जो देश की धरोहर हैं
उन्नति के प्रतीक हैं
राजा को भूख नहीं लगती
इसलिए वे खाने के सभी दाँत
पेट में जमा रखे हैं
देश पर आस्था रखने वाले
मातृभूमि से प्रेम करने वाले
सच्चे नागरिकों को
राजा के दाँतों पर
ऊँगली नहीं करनी चाहिए
ऊँगली करना तो दूर
ऊँगली उठाने वाले लोग
राजद्रोह के अपराधी होते हैं
कठोर दण्ड के भागी होते हैं
किन्तु उन्हे दण्डित
राजा नहीं करते
क्योंकि वे दयालु होने के साथ-साथ
बड़े नेकदिल इंसान है।
नाहक ही
वहमी, वंचक और वाचाल प्रजा
राजा पर झूठा लाँछन लगाती है
कि राजा लालची और विकट स्वार्थी है
छल, प्रपंच और झूठ का पुलिंदा है
मक्कारी और धोखे का प्रतीक
असुरी, अमानवीय और अनैतिक
शक्तियों का साक्षात प्रमाण
लूट, डकैती और उन्माद का
जीवन्त और उत्कृष्ट उदाहरण है
जो, जन की नहीं
केवल मन की बातें करता है
शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का
सुशासन के नाम पर दलाली करता है
भोली-भाली प्रजा को
भेड़िया धँसान भीड़ में धकेल
बरगला-बहलाकर
अपना उल्लू सीधा करता है
जबकि
ऐसा कतई नहीं है
प्रजा है
कि समझने को तैयार ही नहीं है
अब कैसे किसको समझाए साहब !
ये कलयुग है
कलयुग का सब काम ही
उल्टा-पुल्टा है।
धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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