अभिमन्यु नहीं हूँ मैं

अभिमन्यु नहीं हूँ मैं


अभिमन्यु तो नहीं हूँ मैं

न ही वीर 

न ही योद्धा

और न ही उसके जैसा 

व्यूह भेदन कला है मुझमें

परन्तु

पता नहीं क्यों ?

कौरव महारथियों 

महाबलियों

महावीरों ने 

घेर रखा है मुझे

और किए जा रहे हैं वार पर वार

अनवरत

अनथक

और असह्य

देख-सुनकर

जान-बूझकर

मान-समझकर

बिल्कुल निहत्था

निजोर

निरापद 

और निरपराध मुझे

संभवतः वे सब के सब

अर्जुन के समक्ष

अपनी कायरता

कापुरूषता

भीरूता

और अपना दंभयुक्त युद्ध कौशल 

नहीं दिखा पाने की खीझ

उतार रहे हैं 

मुझपर

परन्तु फिर भी 

यह जानते हुए ंभी 

कि पराजय मेरा ही माथा चुमेगी

लड़ूँगा, और लड़ता रहूँगा

जब तक साँसों का साथ रहेगा

हथियार नहीं डालूँगा मैं

क्या हुआ 

अभिमन्यु नहीं हूँ मैं

मगर, अभिमन्यु सा

अदम्य साहस तो है मुझमें 


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

 

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