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अभिमन्यु नहीं हूँ मैं

अभिमन्यु नहीं हूँ मैं अभिमन्यु तो नहीं हूँ मैं न ही वीर  न ही योद्धा और न ही उसके जैसा  व्यूह भेदन कला है मुझमें परन्तु पता नहीं क्यों ? कौरव महारथियों  महाबलियों महावीरों ने  घेर रखा है मुझे और किए जा रहे हैं वार पर वार अनवरत अनथक और असह्य देख-सुनकर जान-बूझकर मान-समझकर बिल्कुल निहत्था निजोर निरापद  और निरपराध मुझे संभवतः वे सब के सब अर्जुन के समक्ष अपनी कायरता कापुरूषता भीरूता और अपना दंभयुक्त युद्ध कौशल  नहीं दिखा पाने की खीझ उतार रहे हैं  मुझपर परन्तु फिर भी  यह जानते हुए ंभी  कि पराजय मेरा ही माथा चुमेगी लड़ूँगा, और लड़ता रहूँगा जब तक साँसों का साथ रहेगा हथियार नहीं डालूँगा मैं क्या हुआ  अभिमन्यु नहीं हूँ मैं मगर, अभिमन्यु सा अदम्य साहस तो है मुझमें  धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346  

मैंने देखा है ईश्वर को

मैंने देखा है ईश्वर को मैंने देखा है ईश्वर को ये मत पूछ कब और कहाँ पर हाँ ! मैंने देखा है ईश्वर को तिल से ताड़ तक, राई से पहाड़ तक कचरों के ढेर में, यानों की टेर में धरती के कण - कण में युग -युग के क्षण - क्षण में सागर के नीचे, आसमान के ऊपर क्षितिज के छोर तक जब - जब झाँका है आँका अमूल्य रचना संसार को मैंने देखा है ईश्वर को जीवन को जीते सलवटों में युग को बदलते करवटों में मृत्यु को पछाड़ते, रोगों को झाड़ते बारिश में भीगते, शीत में ठिठुरते तपन को तार - तार स्वेद से करते तोड़ते घुटनों पर नियति निठुर को मैंने देखा है ईश्वर को पत्थरों को तोड़ते, नदियों को मोड़ते स्वार्थी मनुजों के लिए  धरती से अंबर को गारों से जोड़ते जोड़ते कुर्सिंयाँ, जोड़ते सरकार को करके मुहैया सुविधा संसार को खाकर चटनी, नून संग बासी घट - घट के वासी झोपड़ी में लेते है खट्टी डकार को मैंने देखा है ईश्वर को निर्मोही बच्चों  की निश्छल किलकारी में निर्मम जग में खटती महतारी में  पग पग पर जूझते पिता के प्यार में अकारण रूठने पर भी बहन की मनुहार में अपने पराए गिरे पड़े बिछुड़े  पिछड़े दीन दुखियों के हृदय में उलीचते स्नेह की ...

घरघुंदिया

घरघुंदिया आकाश में जैसे नहीं होती कोई पतंग की बिसात गच्चा खा जाता  सुख, संसार स्वर्ग तेरे घरघुंदिये से बँधा मेमने सा मिमियाता खड़ा रहता किसी कोने में सुन ठक्क होते पाँव  गीत संगीत के  गुनगुनाती गीत कोई जब तू मीत्थी मीत्थी छी प्याली प्याली छी। तेरे घरघुंदिये को बाँधने का प्रयास मतलब साधारण के आगे असाधारण का चुरचुराना है हारकर मजाल ! न झुके नजर कोई तेरी ओर न तरसे तेरे साथ खेलने को बड़े से बड़ा आदमी घरघुदिये में। ओह ! मेरी बिटिया काश ! तुम्हे दे पाता तेरा घरघुंदिया जब तुम घर बसाने जाती। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346