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भीड़

 भीड़ ये भीड़ है बाबू, नासमझ भीड़ भीड़ जानती हैं सिर्फ पत्थर को पूजना पत्थर से मारना पत्थर हो जाना और, पत्थर पर नाम खुदवाना चीखोगे, चिल्लाओगे नही सुनने वाले समझाना चाहोगे नहीं बूझने वाले चुपचाप चलोगे नहीं गुनने वाले हाँ, पागल कहकर पत्थर जरूर मारेंगे तुम चाहते हो आदमी, आदमी बना रहे मेरी मानो ! बैठ जाओ कहीं भी पत्थर होकर। धर्मेन्द्र निर्मल  भिलाईनगर 9406096346

साहसी

 साहसी   तुम साहसी हो साहेब लड़ते नहीं थकते सोते - जागते उठते - बैठते खड़े हो - होकर बैठने के लिए समाज से, देश से , जिंदगी से जिंदगी भर। जिंदगी से जिंदगी भर हम लड़ते हैं बालिश्त पेट के लिए सो जाते हैं जब थकते हैं। धर्मेन्द्र निर्मल  भिलाईनगर 9406096346

राखी

 राखी  आ बाँधू तुम्हे राखी। बाँधू भैया तुम्हे राखी।। जीवन किस्मत का पासा है, सदा रहोगे आशा है,  सुख दुख में मेरे साथी।। कदम कहीं डगमग डोले, कँधे के नीचे आ हौले, जाओगे बन बैसाखी।। फँस जाऊँ किसी उलझन में,  दुनियाँ के विशाल गगन में, दोगे दिशा दिखा झाँकी।। बाँध रही हूँ स्नेह पूरित, करती रहे नित अंकुरित,  प्रेम  हृदय में राखी।। कच्चे धागे में भाई,  सुसज्जित हुई कलाई,  उर निधि सौगात राखी।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346