सम्भावनाएं
सम्भावनाएं सम्भावनाएँ बूढ़ी हो जाती है जवान हो उठती है उदासी आशा जैसे बचपन के दिन खिखियाते बंदर की तरह बार-बार चिढ़ाती है ललमुँही कुण्ठा जाने क्यों ? इसी जगह हो जाता है अडि़यल समय का घोड़ा आदमी खिसियाकर बार-बार मारता है चाबुक असफलता मितवा होना चाहती है कहीं से फूटता है अंकुर लकवाग्रस्त विवेक जूझता है परिस्थितियों से जैसे पेट से चिलकती धूप में मजबूर-मजदूर मकड़ी हो जाता है धैर्य थक हार-कर भी नहीं टूटता जो तब कहीं बुनता है जाल मेहनत का तब कहीं होती है शिकार सफलता।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346